Sunday, 30 April 2017

Era and i poem

 What is the number of innumerable settlements, mind When the country is destroyed by the spots, then what is my favorite? With prolonged angar gagan, the earth flames flutter, Swallowing when death is known to all, what is its own The sad story of the whole world, my compassion is the story! How long will it creep into the wounded humanity How long will it be true to dream of equality All the world is suffering, what is my biggest pain Seven seasons, the world goes on being spoiled
उजड़ रहीं अनगिनत बस्तियाँ,  मन,  मेरी ही बस्ती क्या
धब्बों से मिट रहे देश जब,  तो मेरी ही हस्ती क्या!
बरस रहे अंगार गगन से,  धरती लपटें उगल रही,
निगल रही जब मौत सभी को,  अपनी ही क्या जाय कही
दुनियाँ भर की दुःख कथा है,  मेरी ही क्या करुणा कथा!
जाने कब तक धाब भरेंगे इस घायल मानवता के
जाने कब तक सच्चे होंगे सपने सब की समता के
सब दुनिया पर व्यथा पडी है, मेरी ही क्या बड़ी व्यथा
खौल रहे है  सात समुन्दर,  दूबी जाती है दुनिया
ज्ञान थाह लेता था जिस से, गर्क हो रही वह दुनिया
डूब रही हो सब दुनिया,  जब,  मुझे डूबता गम  तो क्या
हाथ बने किसलिये   करेंगे भू पर मनुज स्वर्ग निर्माण
बुद्धि हुई किस लिए  कि डाले मानव जग  जड़ता में प्राण 
आज हुआ सबका उलटा रुख,  मेरा उलटा पासा क्या
मानव को ईश्वर बनना था, निखिल सृष्टि वश में लानी,
काम अधूरा छोड,  कर रहा आत्मघात मानव ज्ञानी
सब झूठे हो गये,  निशाने,  तुम मुझ से छूटे तो क्या
एक दूसरे का अभिभव कर, रचने एक नये भव को
है सघर्ष निरत मानव अब, फूंक जगत-गत वैभव को
तहस-नहस हो रहा विश्व, तो मेरा अपना आपा क्या!

नरेन्द्र शर्मा